आज मंदिर सूं निकळ्यो तो,
दिल में बस एक ही अरदास—
“हे गोविंद देव!
मने भी बना दे
प्रेम में राधा,
बुद्धि में कृष्ण,
और कर्म में विश्व रो नेतृत्व रो प्रकाश।
यह कविता जयपुर के गोविंद देव जी मंदिर में मंगला आरती के समय एक भक्त के भीतर उठने वाले भावों, प्रश्नोंऔर आध्यात्मिक खोज को व्यक्त करती है। इसमें राधा-कृष्ण के दिव्य दर्शन के माध्यम से प्रेम, भक्ति औरआत्मचिंतन का सुंदर संगम दिखाया गया है। भक्त भीड़ के बीच Binocular से राधा-कृष्ण को निहारते हुए नकेवल उनके रूप और रंग के रहस्य पर प्रश्न करता है, बल्कि अपने जीवन के सबसे गहरे सवालों—प्रेम, साथी, सफलता और नेतृत्व—का उत्तर भी भगवान से पूछता है। कविता भक्ति को केवल पूजा नहीं, बल्किआत्म-परिवर्तन और आत्म-विकास का मार्ग बताती है, जहाँ कृष्ण एक आदर्श वैश्विक नेता के रूप में दिखाई देतेहैं और भक्त उनसे जीवन में साहस, विवेक, प्रेम और सफलता की प्रेरणा माँगता है। इस तरह यह कविता भक्ति, दर्शन और आधुनिक जीवन की आकांक्षाओं को जोड़ते हुए एक गहरी आध्यात्मिक अनुभूति का चित्रण करती है।
मंगला आरती की ठंडी सुबह, गोविंद देव जी का धाम,
जयपुर री हवा बोले धीरे, “आजा भक्त, कर ले राधे-श्याम।”
घंटा-घड़ियाल, शंख री ध्वनि, मन में जागे प्रेम अपार,
राधा रानी ने जब देखा, थरथरा गयो मन रो संसार।
भीड़ घणी थी मंदिर में, हर दिल में बस एक ही आस,
Binocular से देखा मैंने, राधा-कृष्ण रो मधुर प्रकाश।
सोच्यो मन में, श्याम से पूछूं, आज तो पूछूं बात,
क्यों हाथ लाल, मुख श्याम क्यों, कौन सा है ये रहस्यमय घाट?
हे नाथ! कब देसी तू मने, मेरी राधा प्रेम री छाया?
या रुक्मिणी बनकर आएगी, जीवन में सुख री माया?
क्यों हर सवेरे खींच लावे, तेरा दर्शन रो बुलावा?
क्यों भक्तां री भीड़ में, हर आत्मा खुद ने भूल जावे?
क्या भक्ति वो आग है, जामें अहंकार जल जावे?
या भक्ति वो आईना है, जामें इंसान खुद ने पहचान पावे?
क्यों लोग दीवाने हैं भक्ति के, क्या इसमें कोई रहस्य है?
क्या प्रेम, विश्वास और समर्पण ही, जीवन का सच्चा उद्देश्य है?
हे माधव! मुझे भी सिखा दो, तेरी तरह उज्ज्वल होना,
विश्व का नेतृत्व करने का, साहस, करुणा और तेज पिरोना।
क्या भक्ति है वो शक्ति, जो मनुष्य ने भगवान बनावे?
या भगवान ही वो दर्पण, जामें इंसान खुद ने पहचान पावे?
हे माधव! अगर तू विश्व रो नेता है, तो सिखा मने वो चाल,
कैसे प्रेम, नीति और साहस से, जीता जावे हर सवाल?
मने भी दे दे वो दृष्टि, जो सीमां ने तोड़ सके,
जिस दिन समझूं मैं खुद ने, उस दिन श्याम मने जोड़ सके।
राधा-कृष्ण रो प्रेम सिखावे, जीवन रो गूढ़ विधान,
जो खुद ने जीत लेवे मन, वही पावे भगवान।
मेरी हर जीत, हर सपना, तेरे चरणों में अर्पित है,
हे गोविंद! मेरा मार्ग तू ही है, मेरा भविष्य तू ही निश्चित है।
ऋत्विक वाडकर