Sunday, 8 February 2026

गोविंद देव के द्वार पर श्याम से संवाद


आज मंदिर सूं निकळ्यो तो,
दिल में बस एक ही अरदास
हे गोविंद देव!
मने भी बना दे
प्रेम में राधा,
बुद्धि में कृष्ण,
और कर्म में विश्व रो नेतृत्व रो प्रकाश।



यह कविता जयपुर के गोविंद देव जी मंदिर में मंगला आरती के समय एक भक्त के भीतर उठने वाले भावोंप्रश्नोंऔर आध्यात्मिक खोज को व्यक्त करती है। इसमें राधा-कृष्ण के दिव्य दर्शन के माध्यम से प्रेमभक्ति औरआत्मचिंतन का सुंदर संगम दिखाया गया है। भक्त भीड़ के बीच Binocular से राधा-कृष्ण को निहारते हुए केवल उनके रूप और रंग के रहस्य पर प्रश्न करता हैबल्कि अपने जीवन के सबसे गहरे सवालोंप्रेमसाथीसफलता और नेतृत्वका उत्तर भी भगवान से पूछता है। कविता भक्ति को केवल पूजा नहींबल्किआत्म-परिवर्तन और आत्म-विकास का मार्ग बताती हैजहाँ कृष्ण एक आदर्श वैश्विक नेता के रूप में दिखाई देतेहैं और भक्त उनसे जीवन में साहसविवेकप्रेम और सफलता की प्रेरणा माँगता है। इस तरह यह कविता भक्तिदर्शन और आधुनिक जीवन की आकांक्षाओं को जोड़ते हुए एक गहरी आध्यात्मिक अनुभूति का चित्रण करती है।



मंगला आरती री बेला में, गोविंद देव जी रो द्वार खुल्यो,
जयपुर री ठंडी हवा मेंभक्त रो मन प्रेम सूं भर्यो।
घंटा-घड़ियालशंख री गूंजआत्मा में जाग्यो उजास,
राधा रानी री नजर पड़ते हीथरथरायो मन रो विश्वास।


भीड़ घणी थी मंदिर मेंहर दिल में बस एक ही चाह,
Binocular 
से देख्यो मैंनेश्याम-राधा रो दिव्य प्रवाह।
भीड़ में भी अलग दिखेप्रेम रो वो अनंत रूप,
जैसे समय थम गयो होऔर जगत बन गयो हो एक धूप।


मन पूछ्यो श्याम सूं धीरे
हे नाथहाथ लाल क्यों हैंमुख श्याम क्यों है आज?”
क्या ये रंग प्रेम रो हैया ब्रह्मांड रो कोई रहस्यमय राज?

हे माधवकब देसी तू मनेमेरी राधा प्रेम री पहचान?
या रुक्मिणी बनकर आएगीजीवन में कोई दिव्य मुस्कान?

क्यों हर सवेरे खींच लावेतेरा दर्शन रो बुलावा?
क्यों भक्तां री भीड़ मेंहर आत्मा खुद ने भूल जावे?

क्या भक्ति वो आग हैजामें अहंकार जल जावे?
या भक्ति वो आईना हैजामें इंसान खुद ने पहचान पावे?

हे कृष्णअगर तू विश्व रो नेता है,
तो सिखा मने वो कला
कैसे प्रेमनीतिसाहस और विवेक सूं
दुनिया ने जीत्यो जावे बिना युद्ध रचाए।


मने भी दे दे वो दृष्टि,
जो डर ने तोड़ सकेसीमां ने लांघ सके,
जिस दिन मैं खुद ने पहचान लूं,
उस दिन श्यामतू मने खुद सूं जोड़ सके।


हे नाथकब दोगे तुम मुझेमेरी राधा प्रेम की पहचान?
या रुक्मिणी बनकर आएगीजीवन में कोई मुस्कान?

क्यों हर सुबह खींच लाती हैतेरे दर्शन की प्यास?
क्यों भक्तों की इस भीड़ मेंहर दिल बन जाता है खास?

क्यों लोग दीवाने हैं भक्ति केक्या इसमें कोई रहस्य है?

क्या प्रेमविश्वास और समर्पण हीजीवन का सच्चा उद्देश्य है?
हे माधवमुझे भी सिखा दोतेरी तरह उज्ज्वल होना,
विश्व का नेतृत्व करने कासाहसकरुणा और तेज पिरोना।


मेरी हर जीतहर सपनातेरे चरणों में अर्पित है,
हे गोविंदमेरा मार्ग तू ही हैमेरा भविष्य तू ही निश्चित है।



ऋत्विक वाडकर 





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